'साहित्य के अध्ययन से हमको जहाँ एक ओर आनंद मिलता है, तो दूसरी ओर उसके जन्म स्थान की सभ्यता, संस्कृति, भाषा, रहन-सहन आदि का परिचय भी मिल जाता है। इस प्रकार से साहित्य अपने समय का इतिहास होता है। इस इतिहास में कल्पना अवश्य होती है लेकिन उसमें निहित सत्य का सत्य होता है। समाज में जो कुछ घटित हो रहा है, या घटित हो सकता है, साहित्यकार उसी को अपने साहित्य में स्वर देता है। जो साहित्य समाज से जुड़ा नहीं होता, समाज की अवहेलना करता है, वह आगे चलकर स्वयं उपेक्षित हो जाता है। साहित्य और समाज के पारस्परिक संबंधों को लेकर विद्वानों में दो प्रकार के वर्ग बन गए हैं। एक साहित्य की कलात्मकता को प्रमुखता देता है और कहता है कि कला, कला के लिए होनी चाहिए। समाज से उसका कोई लेना-देना नहीं है। दूसरा वर्ग साहित्य को समाज के प्रति उत्तरदायी मानता है और कहता है कि साहित्य समाज के लिए है। साहित्यकार यदि समाज की उपेक्षा कर साहित्य-रचना करता है तो आगे चलकर उसका साहित्य समाज शून्यालाप कहला सकता है। समाज को दृष्टि में रखकर लिखा गया साहित्य, समाज द्वारा आदर पाता है। ऐसा साहित्य अमर होता है। समाज सुरक्षा, भोजन, वस्त्र, आवास आदि की सुविधाएँ देता है, तभी साहित्यकार को कल्पना लोक में विचरण करने, सोचने और कहने-लिखने की प्रेरणा और सुविधा मिलती है। साहित्य समाज से कटकर जीवित नहीं रह सकता।'______ 1. उपर्युक्त गद्यांश के उचित सारांश का चयन कीजिये जिसमें सारांश-लेखन के आवश्यक तत्व मौजूद हों-
Correct!
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2. गद्यांश से साहित्य के विषय में क्या-क्या जानकारी मिलती है?
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3. गद्यांश में साहित्य से सम्बंधित कौन से तथ्य निहित हैं?
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4. गद्यांश के आधार पर साहित्य और समाज का वास्तविक जीवन में क्या सम्बन्ध है? सर्वोचित विकल्प का चयन करें-
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5. 'उपेक्षा' के विलोमार्थी शब्द का चयन करें-
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