यशपाल ने 'दिव्या' (1945) की भूमिका में लिखा, इतिहास विश्वास की नहीं, विश्लेषण की वस्तु है। अपने रचनात्मक सामर्थ्य और परिस्थितियों के सुलझाव के अपने प्रयत्नों के परिचय से जाति वर्तमान और भविष्य और रचना के लिए निर्देश पाती है। इस प्रकार यशपाल इतिहास को सिर्फ अतीत नहीं, एक सतत् प्रवाह के रूप में देखते हैं और वर्तमान को समुन्नत एवं समृद्ध बनाने की दृष्टि से उसके महत्त्व को रेखांकित करते हैं। 'दिव्या' में उस समाज के अंतर्विरोध स्त्री की नियति को गहराई से उद्घाटित करते हैं। दिव्या स्वतंत्र नारी नहीं है. इसलिए अपनी इच्छा से वह बौद्ध धर्म में प्रवर्जित होने का भी अधिकार नहीं रखती। यशपाल ने इतिहास की पृष्ठभूमि पर नारी की नियति, युद्ध और शांति एवं वर्ग संघर्ष की समस्याओं को अंकित किया है। 'अमिता' (1956) विश्व शांति के उनके प्रयासों के कारण ही जवाहरलाल नेहरू को समर्पित की गई थी। 'अप्सरा का श्राप' (1965) में भी यशपाल की मुख्य चिंता पुरुष वर्ग के निरंकुश दमन की है, जिसने अपने स्वार्थ और प्रमाद में धर्म और व्यवस्था के नाम पर नारी का सदैव ही निर्दय शोषण किया है। स्पष्ट है कि इतिहास की पृष्ठभूमि का उपयोग वे एक ऐसे समाज के निर्माण की दृष्टि से करते हैं जो इन अंतर्विरोधों से मुक्त होगा। उनकी या अन्य प्रगतिवादी लेखकों के ऐतिहासिक उपन्यास हावर्ड फॉस्ट के ऐतिहासिक उपन्यासों की तुलना में, कलात्मक दृष्टि से उतने प्रौढ़ और गम्भीर भले ही न बन पड़े हों, लेकिन इतिहास के उपयोग की नई सम्भावनाओं का संकेत उनसे अवश्य मिलता है। उनके प्रमुख उपन्यास हैं दादा-कॉमरेड, देशद्रोही, झूठा सच, बारह घंटे तथा मक्रील और फूलों का कुर्ता उनके कहानी संग्रह हैं।____________ 1. 'इतिहास विश्वास की नहीं विश्लेषण की वस्तु है।' से लेखक का क्या अभिप्राय है?
Correct!
Wrong!
2. यशपाल ने अपनी कौन सी पुस्तक जवाहरलाल नेहरू को समर्पित की है?
Correct!
Wrong!
3. इतिहास के विषय में लेखक का विचार नहीं है-
Correct!
Wrong!
4. निम्नलिखित कृतियों में से यशपाल द्वारा लिखित उपन्यास नहीं है-
Correct!
Wrong!